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प्राकृतिक और सिंथेटिक मेंथा: अंतर, गुणवत्ता, उद्योग की पसंद एवं भारतीय किसानों की चुनौतियाँ

 भारत विश्व का प्रमुख मेंथा उत्पादक देश है, विशेषकर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, संभल जैसे क्षेत्रों में। मेंथा ऑयल (पुदीना तेल) और उससे प्राप्त मेंथॉल का उपयोग दवाइयों, कॉस्मेटिक्स, खाद्य पदार्थों, टूथपेस्ट और सिगरेट जैसे उत्पादों में होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से सस्ता सिंथेटिक मेंथॉल प्राकृतिक मेंथा की जगह ले रहा है, जिससे भारतीय किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।


प्राकृतिक और सिंथेटिक मेंथा में मुख्य अंतर

पहलूप्राकृतिक मेंथासिंथेटिक मेंथा
स्रोतमेंथा अर्वेंसिस (जापानी पुदीना) की पत्तियों से भाप आसवन द्वारा निकाला जाता है। मुख्य उत्पादक: भारत और चीन।रासायनिक संश्लेषण से बनाया जाता है (पेट्रोकेमिकल्स या साइट्रल से)। प्रमुख कंपनियाँ: BASF, Symrise आदि।
संरचनामुख्य रूप से L-मेंथॉल (प्राकृतिक आइसोमर) के साथ सूक्ष्म प्राकृतिक यौगिक जो वास्तविक पुदीने की सुगंध देते हैं।L-मेंथॉल या DL-मेंथॉल मिश्रण, अत्यधिक शुद्ध लेकिन प्राकृतिक सूक्ष्म यौगिकों की कमी।
उत्पादन प्रक्रियाकृषि आधारित – खेती, कटाई, आसवन और क्रिस्टलाइजेशन।प्रयोगशाला/फैक्ट्री में बहु-चरणीय रासायनिक प्रक्रिया।
कीमतमहँगा और अस्थिर (फसल, मौसम पर निर्भर)।30-40% सस्ता और स्थिर।
आपूर्तिमौसम और खेती पर निर्भर, उतार-चढ़ाव।वर्ष भर स्थिर उत्पादन।


गुणवत्ता में अंतर

प्राकृतिक मेंथा में मौजूद सूक्ष्म यौगिक इसे अधिक जटिल और वास्तविक पुदीने की सुगंध प्रदान करते हैं, जो प्रीमियम उत्पादों (जैसे ऑर्गेनिक कॉस्मेटिक्स, उच्च गुणवत्ता वाली दवाएँ) में पसंद किया जाता है। सिंथेटिक मेंथॉल ठंडक तो समान देता है, लेकिन सुगंध में थोड़ी कमी रहती है – इसे कुछ विशेषज्ञ "कम nuanced" बताते हैं। अधिकांश औद्योगिक उपयोगों में यह अंतर नगण्य होता है, इसलिए सिंथेटिक स्वीकार्य है।

उद्योग क्यों सिंथेटिक को तरजीह दे रहा है?

  • लागत बचत: सिंथेटिक मेंथॉल प्राकृतिक से 30-40% सस्ता है।
  • स्थिर आपूर्ति: मौसम या फसल की अनिश्चितता से मुक्त।
  • बड़े पैमाने का उत्पादन: टूथपेस्ट, च्युइंग गम, सिगरेट जैसे मास-मार्केट उत्पादों में कंपनियाँ लागत कम रखना चाहती हैं।
  • आयात का दबाव: जर्मनी, चीन आदि से सस्ता सिंथेटिक मेंथॉल भारत में आयात हो रहा है।

नतीजतन, प्राकृतिक मेंथा की मांग घटी है और 2024-2025 में भारत में मेंथा क्षेत्रफल में 25-30% की गिरावट दर्ज की गई।

प्राकृतिक मेंथा का भविष्य

2025-2026 में भी प्राकृतिक मेंथा उत्पादन में मामूली गिरावट की संभावना है। यदि उपभोक्ताओं में "नेचुरल" और ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग बढ़ी, तो प्रीमियम सेगमेंट में अवसर बन सकता है। लेकिन वर्तमान में सिंथेटिक का दबदबा बढ़ रहा है। नीतिगत सहायता (सब्सिडी, आयात प्रतिबंध) या जलवायु अनुकूल खेती के बिना प्राकृतिक मेंथा का क्षेत्रफल और सिकुड़ सकता है।

किसानों के सामने चुनौतियाँ

  • कम मांग और कीमत: सिंथेटिक के कारण प्राकृतिक मेंथा ऑयल की कीमतें दबाव में।
  • उच्च उत्पादन लागत: सिंचाई, मजदूरी, कीटनाशक और करों का बोझ।
  • जलवायु परिवर्तन: अनियमित मानसून, सूखा या अतिवृष्टि से फसल नुकसान।
  • फसल बदलाव: किसान गन्ना, गेहूँ जैसी अधिक लाभकारी फसलों की ओर जा रहे हैं।
  • आयात प्रतिस्पर्धा: सस्ते विदेशी सिंथेटिक मेंथॉल से स्थानीय उद्योग प्रभावित।

यदि समय रहते नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो भारत का प्राकृतिक मेंथा उद्योग और संकट में पड़ सकता है। किसानों को वैकल्पिक फसलों या मूल्य संवर्धन (जैसे ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन) की ओर सोचना होगा।

हार्वेस्ट ट्रैक रिसर्च फरवरी 2026







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