भारत विश्व का प्रमुख प्राकृतिक मेंथा (पुदीना) उत्पादक देश है, जहाँ उत्तर प्रदेश (बाराबंकी, संभल, रामपुर आदि) मुख्य केंद्र हैं। मेंथा ऑयल और मेंथॉल का उपयोग फार्मा, कॉस्मेटिक्स, फूड एवं टोबैको उद्योग में होता है। लेकिन सिंथेटिक मेंथॉल की बढ़ती लोकप्रियता से प्राकृतिक मेंथा का उत्पादन लगातार घट रहा है, जिससे लाखों किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
वर्तमान उत्पादन स्तर
- 2022-23 में बाराबंकी (भारत का ~70% उत्पादन) में मेंथा ऑयल उत्पादन लगभग 11,200 मीट्रिक टन था, जो 2024-25 में घटकर 7,950 मीट्रिक टन रह गया – करीब 30% गिरावट।
- राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक मेंथा उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में 25-30% की कमी दर्ज की गई है।
- 2025-26 सीजन के लिए शुरुआती अनुमान बताते हैं कि क्षेत्रफल एवं उत्पादन में मामूली और गिरावट आएगी, क्योंकि किसान अधिक लाभकारी फसलों की ओर जा रहे हैं।
- वैश्विक मांग बढ़ रही है, लेकिन भारत का प्राकृतिक उत्पादन सिंथेटिक प्रतिस्पर्धा से दबाव में है।
उत्पादकता बढ़ाने के उपाय
मेंथा की प्रति हेक्टेयर उपज 150-200 क्विंटल तक पहुँचाई जा सकती है, यदि वैज्ञानिक विधियाँ अपनाई जाएँ:
- उन्नत किस्में: CIMAP द्वारा विकसित CIM-Unnati (जलवायु प्रतिरोधी), Kosi, CIM-Kranti, Himalaya, Saksham जैसी उच्च तेल वाली किस्में लगाएँ। ये पारंपरिक किस्मों से 20-30% अधिक उपज देती हैं।
- मिट्टी एवं तैयारी: रेतीली दोमट मिट्टी, pH 6-8, अच्छी जल निकासी वाली। गहरी जुताई एवं जैविक खाद (गोबर/कम्पोस्ट) का उपयोग।
- बुवाई विधि: नर्सरी से रोपाई (ट्रांसप्लांटिंग) बेहतर – 80-90 दिनों में कटाई तैयार। सीधी बुवाई से 110-120 दिन लगते हैं।
- सिंचाई एवं उर्वरक: ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत एवं समान वृद्धि। संतुलित NPK एवं सूक्ष्म पोषक तत्व।
- कीट-रोग प्रबंधन: एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM), जैविक कीटनाशक एवं समय पर छिड़काव।
- रिले क्रॉपिंग: गेहूँ के साथ मेंथा की रिले क्रॉपिंग से अतिरिक्त आय।
उद्योग की गुणवत्ता पसंद एवं कारण
- प्राकृतिक मेंथा: सूक्ष्म यौगिकों से जटिल एवं वास्तविक पुदीने की सुगंध। प्रीमियम, ऑर्गेनिक एवं उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों (दवाएँ, कॉस्मेटिक्स, अरोमाथेरेपी) में पसंद।
- सिंथेटिक मेंथा: सस्ता (30-40% कम), स्थिर आपूर्ति, एकसमान शुद्धता। मास-मार्केट उत्पादों (टूथपेस्ट, च्युइंग गम, सिगरेट) में प्रमुखता।
- उद्योग क्यों सिंथेटिक पसंद करता है? लागत बचत, वर्ष भर उपलब्धता, स्केलेबिलिटी। केवल 35% उपभोक्ता ही "नेचुरल" लेबल के लिए प्राकृतिक को तरजीह देते हैं।
प्राकृतिक मेंथा का भविष्य
यदि ऑर्गेनिक एवं नेचुरल उत्पादों की वैश्विक मांग बढ़ी, तो प्रीमियम सेगमेंट में अवसर हैं। लेकिन वर्तमान में सिंथेटिक का वर्चस्व बढ़ रहा है। नीतिगत सहायता (सब्सिडी, आयात शुल्क, MSP), जलवायु अनुकूल किस्में एवं मूल्य संवर्धन (ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन) के बिना उत्पादन और घट सकता है। 2026-2030 तक वैश्विक मेंथा बाजार बढ़ेगा, लेकिन भारत का प्राकृतिक हिस्सा सिकुड़ सकता है।
किसानों के सामने चुनौतियाँ
- कम कीमत एवं मांग: सिंथेटिक से प्रतिस्पर्धा।
- उच्च लागत: सिंचाई, मजदूरी, उर्वरक एवं कर।
- जलवायु जोखिम: अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़।
- क्षेत्रफल कमी: किसान गन्ना, गेहूँ आदि की ओर जा रहे।
- आयात दबाव: चीन, जर्मनी से सस्ता सिंथेटिक मेंथॉल।
समय रहते उन्नत तकनीक अपनाने, सहकारी मॉडल एवं सरकारी सहायता से किसान इस संकट से उबर सकते हैं।
हार्वेस्ट ट्रैक रिसर्च फरवरी 2026
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